इसमें हम वैदिक समाज, वैदिक ग्रन्थ, ऋग्वैदिक से उत्तर-वैदिक चरणों तक परिवर्तन, धर्म, उपनिषद् से सम्बन्धित विचारधारा, राजनैतिक एवं सामाजिक संगठन : राजतन्त्र तथा वर्ण व्यवस्था का विकास (Vedic civilization in Hindi - वैदिक सभ्यता और संस्कृति, Vedic Society. The Vedic Texts, Change from Regvedic to Later Vedic Phases. Religion, Upanishedic Thought. Political and Social Organisation : Evolution of Monarchy and Varna System) को पढ़ेंगे।

Vedic civilization in Hindi - वैदिक सभ्यता और संस्कृति

Vedic Civilization in Hindi PDF - वैदिक सभ्यता और संस्कृति

वैदिक संस्कृति (Vedic Culture)

सिन्धु घाटी की सभ्यता के पतन हो जाने पर भारत के अनेक भागों में विभिन्न संस्कृतियों का उदय हुआ, जिनमें प्रमुख रूप से आर्य सभ्यता थी।

आर्यों की सभ्यता को जानने के पुरातात्विक स्रोत नहीं के बराबर है एवं साहित्यिक स्रोतों में वैदिक साहित्य प्रमुख है।

वेदों से सम्बद्ध होने के कारण ही आर्य सभ्यता को वैदिक संस्कृति (Vedic culture) कहा जाता है।

आर्यों का परिचय

आर्यों के सन्दर्भ में जानने से पूर्व यह अनिवार्य हो जाता है कि हम सबसे पहले आर्य शब्द पर विचार करें।

आर्य शब्द मूलतः संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ श्रेष्ठ, उच्च कुल में जन्मा, इत्यादि होता है, वशिष्ठ स्मृति में आर्य शब्द के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा गया है-

"जो रूप-रंग, आकृति-प्रकृति, सभ्यता-शिष्टता, धर्मकर्म, ज्ञान-विज्ञान और आचार-विचार तथा शील स्वभाव में सर्वश्रेष्ठ हो उसे आर्य कहते हैं।"

अमरकोष के अनुसार आर्य, सभ्य, सज्जन, साधु, कुलीन, महाकुलीन के अर्थ में प्रयुक्त होता है।

इसके अतिरिक्त प्रसिद्ध विद्वानों के एक वर्ग के अनुसार आर्य शब्द मूलतः 'अरि' शब्द से बना है जिसका अर्थ विदेशी या अजनवी होता है।

यद्यपि 'आर्य' शब्द का यह अर्थ किसी भी तरह से तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता।

साधारणतया आर्य शब्द जाति विशेष का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन यह भी माना जाता रहा है कि 'आर्य' शब्द जातीयता को नहीं 'भाषायी समूह' की तरफ संकेत करता है।

आर्यों का सबसे पहले उल्लेख बोगोजकोई (पश्चिम एशिया) की शांति सन्धि 1350 ई.पू. में मिलता है।

बोगाजकोई की शांति संधि हित्तदस (Hettites) के राजाओं एवं मितामी साम्राज्य के मध्य हुई, जिसमें मित्र, वरूण एवं इन्द्र देवताओं का आह्वान साक्षियों के रूप में किया गया था।

2000 ई. पू. के आसपास कई जनसमुदाय संस्कृत, लेटिन, ग्रीक, श्लाव इत्यादि भाषाएँ बोलते थे एवं सभी भाषाएं एक-दूसरे से सम्बद्ध थी. इन्हें भोरोपीय भाषा (Indian European language) कहा जाता है।